रिरायती जनता बनाम रोता प्रधानमंत्री बृजेंद्र सोनी*

*रिरायती जनता बनाम  रोता प्रधानमंत्री बृजेंद्र सोनी*

अनूपपुर अनूपपुर जिले के वरिष्ठ  कम्युनिस्ट नेता व एडवोकेट बृजेंद्र सोनी ने कहा कि विश्व के दूसरे बड़े राष्ट्र के आदरणीय प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय मीडिया के सामने आठवीं बार अपने आंसू बहाए हैं कुछ लोगों ने इसे भावुकता करार दिया कुछ ने घड़ियाली आंसू मैं उनके आक्षेप के रियल्टी पर नहीं जाना  चाहता। भावुकता मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, वह जब दुखी होता है भावुक होता है मन में कोई टीस उठती है  तो आंसू छलकना एक स्वाभाविक इंद्रिय गतिविधियां होती है। सवाल इस पर नहीं है कि प्रधानमंत्री क्यों रोए ? सवाल इस पर है की जनता गुहार किस बात पर लगा रही है
 श्री सोनी ने कहा कि जब करोना  काल के प्रथम दौर 2020 में हमने पलायन करते हुई मजदूरों के उस जनसैलाब को देखा था तो देश के बहुत से नागरिक भावुक हो गए थे बड़े-बड़े राजनेता के आंखों से आंसू निकल गए थे ,नोटबंदी के दौरान जब कतारों में लगे लोगों की मौतें हो रही थी तब भी देश रोया था।
 प्रधानमंत्री ने कहा था कि मुझे 50 दिन और दीजिए अगर मैं गलत गलत साबित होता हूं तू जो चौराहा चुनेंगे आप वहां में मौजूद रहूंगा ।
आगे की बात असंसदीय है,इसलिए उसे लिखना मैं जरूरी नहीं समझता। पर आखिर प्रधानमंत्री क्यों रोये क्या अपनी असफलता के लिए ,क्या लगातार हो रही मौतों के उस चित्कार से वो द्रवित हो गए, या गंगा की नदियों में बहते हुए लाशों को देखकर ,क्या इसलिए वह रोए या इसलिए कि वह इस काबिल नहीं रहे इन समस्याओं से पार पाने मे वह असफल साबित हुए।
जहां तक मुझे याद है आजाद भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी ,चौधरी चरण सिंह ,
देवगौड़ा, बी पी सिंह, चंद्रशेखर ,आई के गुजराल, नरसिम्हा राव,मनमोहन सिंह, तमाम प्रधानमंत्रियों ने कभी भी मीडिया के सामने अपने आंसू नहीं गिराए तो क्या इसका यह अर्थ लगा लिया जाना चाहिए कि वह निर्दयी प्रधानमंत्री थे 
और हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री बहुत ही संवेदनशील है अब यहां पर सवाल भावुकता और संवेदनशीलता की आती है भावुकता तात्कालिक होती है संवेदनशीलता चिरस्थाई होता है जो व्यक्ति संवेदनशील होता है वह परिस्थितियों को उसके निदान की रूपरेखा तय करता है।भावुकता तात्कालिक होती है उसी समयआंसू बहते हैं कभी-कभी सी ग्रेट की फिल्में देख कर के भी आंसू बहा लेते हैं नायक नायिकाओं के बिछड़ने पर ।
हमारे आंखों में आंसू टपक आता है 
किसी बेगुनाह को सरेआम पीटते देख कर के भी हमारे आंखों से आंसू छलक ने लगता है 
यह 3 घंटे का आलाप होता है 
 लेकिन संवेदनशीलता वह तत्व होता है जब समाज के अंदर व्याप्त विसंगतियों को दुरुस्त करने के लिए हम एक कार्य नीति तैयार करते हैं एक साल के अंतराल में जब तमाम वैज्ञानिक चिकित्सक और विश्व समुदाय इस बात की चेतावनी दे रहा था कि कोरोनावायरस की लहर आएगी अगर हम संवेदनशील होते तो सार्वजनिक क्षेत्रों को बेचने के बजाय बड़ा संसद भवन में प्रधानमंत्री आवास बनाने के बजाए हम स्वास्थ्य सेवाओं पर काम कर रहे होते लेकिन हमने ऐसा नहीं किया तो इसका सीधा अर्थ क्या है यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम भावुक तो हैं पर संवेदनशील नहीं अगर हमारे अंदर थोड़ी भी संवेदनाएं होती एक अरब पैतीस करोड़ के इस मुल्क के अंदर जिस तरीके से जिंदगी की भीख मांगती जनता सड़कों पर घूम रही है उससे हम बच सकते थे 
लेकिन हमने ऐसा नहीं किया सड़कों पर 6 महीने से ज्यादा आंदोलनरत किसानों के बारे में हमने नहीं सोचा लगातार सड़कों पर हो रही मार्वलिचिंग पर हमने ध्यान नहीं दिया इंटेलेक्चुअल एक्टिविस्ट जिनकी उम्र 80 से भी ज्यादा है सालों से जेल में बंद है बिना किसी सबूत के उनके रिहाई के बारे में हमने नहीं सोचा ।
सच में प्रधानमंत्री आप भावुक हैं ।
पर संवेदनशील नहीं।
इस देश को एक संवेदनशील प्रधानमंत्री की आवश्यकता है भावुक प्रधानमंत्री कि नहीं इसलिए इस देश की रियाया रिरायिया रही है और भावुक प्रधानमंत्री आंसू बहा रहे है

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